भाजपा में बढ़ती नाराज़गी और गुटबाज़ी! क्या रायगढ़ से उठी चिंगारी बनेगी बड़े बदलाव का संकेत?
रायगढ़। भारतीय जनता पार्टी को लंबे समय से अपने समर्पित कार्यकर्ताओं की पार्टी माना जाता रहा है। यही कार्यकर्ता भाजपा की सबसे बड़ी ताकत और संगठन की रीढ़ माने जाते हैं। लेकिन हाल के दिनों में प्रदेश में जो राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, उन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भाजपा के भीतर सब कुछ वास्तव में ठीक चल रहा है?
प्रदेश की राजधानी रायपुर से लेकर रायगढ़ तक संगठन के भीतर असंतोष, नाराज़गी और गुटबाज़ी की चर्चाएँ तेज़ होती दिखाई दे रही हैं। कई कार्यकर्ता पार्टी से दूरी बना रहे हैं, तो कई अपने ही नेतृत्व और सरकार के फैसलों पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं।
रायपुर से उठे असंतोष के स्वर
रायपुर नगर निगम में एल्डरमैनों की नियुक्ति के बाद कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने नाराज़ होकर इस्तीफा दे दिया। सोशल मीडिया पर भी भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी ही सरकार के निर्णयों पर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से असहमति जताई गई।
वहीं, बारिश के मौसम और रात के समय नकटी गांव में लगभग 75–80 मकानों पर बुलडोजर कार्रवाई के बाद भाजपा के भीतर से ही विरोध के स्वर सुनाई देने लगे। इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का अवसर दिया और प्रदेशभर में भाजपा सरकार की आलोचना हुई।
रायगढ़ में भी गुटबाज़ी का जिन्न बाहर आया
कुछ समय पहले तक ऐसा माना जा रहा था कि रायगढ़ भाजपा में सब कुछ सामान्य है, लेकिन अंदर ही अंदर असंतोष की आग सुलग रही थी।
इसका पहला बड़ा संकेत तब मिला जब भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रवि भगत ने अपने जन्मदिन के दिन ही पार्टी के सभी दायित्वों से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। इसके बाद एल्डरमैन नियुक्ति ने संगठन के भीतर मौजूद नाराज़गी को और उजागर कर दिया।
विधानसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महिला कार्यकर्ताओं का एक वर्ग भी स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं की नाराज़गी भी समय-समय पर सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आती रही है।
कौन हैं रवि भगत?
रवि भगत लैलूंगा विधानसभा क्षेत्र के आदिवासी समाज से आने वाले भाजपा के युवा और जुझारू नेताओं में गिने जाते हैं। उनकी पहचान एक आंदोलनकारी, बेबाक और मुखर नेता के रूप में रही है। वे हमेशा जनहित के मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखने के लिए जाने जाते हैं।
विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने लैलूंगा से रायगढ़ कलेक्टर कार्यालय तक पैदल मार्च कर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से वे संगठन और राजनीति से दूरी बनाए हुए दिखाई दे रहे हैं।
आखिर रवि भगत की नाराज़गी का कारण क्या है?
- रवि भगत लगातार ऐसे मुद्दों पर मुखर रहे, जिन पर अक्सर सत्ता पक्ष के नेता सार्वजनिक रूप से बोलने से बचते हैं।
- फ्लाई ऐश प्रदूषण के मुद्दे पर उन्होंने अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा किया।
- रायगढ़ के उद्योगों में स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की मांग को लेकर लगातार आवाज़ उठाई।
- डीएमएफ (जिला खनिज न्यास) की राशि के उपयोग और विकास कार्यों पर सवाल उठाए।
- अपनी ही सरकार के मंत्रियों और प्रशासन के कामकाज पर भी खुलकर टिप्पणी की।
- जनहित के मुद्दों पर समझौता न करने की उनकी छवि लगातार मजबूत होती गई।
- सबसे बड़ा सवाल
- अब राजनीतिक गलियारों में कई सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं—
- क्या रवि भगत का मुखर स्वभाव उनके राजनीतिक सफर में बाधा बना?
- क्या जनहित के मुद्दों पर अपनी ही सरकार से सवाल पूछना उन्हें भारी पड़ गया?
- क्या आदिवासी समाज में तेजी से बढ़ती उनकी लोकप्रियता कुछ नेताओं को असहज कर रही थी?
- क्या वे संगठन के भीतर की गुटबाज़ी और राजनीति का शिकार हुए?
- या फिर इसके पीछे कोई और राजनीतिक रणनीति काम कर रही है?


